परिणयसूत्र बंधन शक्ति उपासना का पर्व - परमपूज्य प्रेमभूषण जी महाराज
श्रीराम कथा के द्वितीय दिवस दिया प्रेम, संतुष्टि, समर्पण का संदेश
अनूपपुर(प्रकाश सिंह परिहार):- श्रीराम कथा आयोजन समिति अनूपपुर द्वारा जिला मुख्यालय में आयोजित परमपूज्य श्री प्रेमभूषण जी महाराज ने श्रीराम कथा के द्वितीय दिवस प्रेम , संतुष्टि और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का संदेश देते हुए कहा कि रोने वाले पर कोई कृपा नहीं करता। इसलिए जो प्राप्त है, उससे संतुष्ट रहना चाहिए। ईश्वर से जो मिला है उससे प्रसन्न रहो।
भक्त अपने भगवान को पूर्ण समर्पण , पूरे विश्वास से पकड़े रहते हैं। भगवान के आसरे रहते हैं। लेकिन आवश्यक है कि भगवान के निर्दिष्ट आचरण का पालन किया जाए। परमपूज्य जी ने कथा में कहा कि मन, वाणी और कार्य से जो भगवान की सेवा करते हैं , भगवान उनका विशेष ध्यान रखते हैं । भगवान से आभाव का रोना मत रोईये और मांग मत करिये । जो प्राप्त है ,उसे भगवान जी कृपा समझ स्वीकार करें और भगवान जी के लिये आभारी रहें। जितने भगवान के भगत हुए, वो संतुष्ट और प्रसन्न थे। उन्होंने कभी नहीं मांगा। जो हर पल प्रसन्न रहता है, प्रभू उससे बहुत खुश रहते हैं।
ताडकासुर की कथा का व्याख्यान करते हुए प्रेमभूषण जी ने कहा कि तारक नाम का असुर था। तारक मतलब बीमारी । देवताओं को बहुत कष्ट देता था।
ब्रम्हा जी से वर मांगा कि शिव के तेज से उत्पन्न पुत्र ही मुझे मार सके। शिव जी तप में लीन हैं। ताडकासुर देवताओं को त्रास देने लगा। देवता ब्रम्हा जी के पास गये। उन्होंने शिव जी को तपस्या से जगाने को कहा।
कामदेव बसंत ऋतु मे अपनी अप्सराओं को लेकर शिव जी के पास पहुंच गये।कामदेव की माया से पूरी सृष्टि उनके वशीभूत हो गयी।भगवान शिव पर कामनाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जहाँ राम ,वहाँ काम का असर नहीं होता। तब कामदेव ने पुष्प के धनुष पर पंचबाण शिव पर छोड़ दिया। तपस्या भंग होते ही शिव की दृष्टि खुलते ही कामदेव जल कर राख हो गये। रति जी शिव की शरण में पहुंची। शिव - आपका पति सबको व्यापेगा। तब से कामदेव का वास रक्त में है। शिव जी ने रति को कहा कि द्वापर युग मे प्रद्युम्न आपको पति रुप में प्राप्त होंगे।
देवतागण भगवान शिव की शरण में पहुंचे ।
मनुष्य के स्वार्थ में उसका परमार्थ विलीन हो जाता है।
भगवान शिव ने पूछा -- आप लोग किस उद्देश्य से आए हैं ।
सुख में जाएं या ना जाएं। लेकिन दुख में जरुर उपस्थित रहें। ताडकासुर से त्रास पाकर देवता शिव की शरण में पहुंचे । परमपूज्य जी ने
विवाह अद्भुत संस्था है बतलाते हुए कहा कि इसे परिणय सूत्र बंधन कहा जाता है। विवाह, शादी हमारे शब्द नहीं हैं।
परिणय सूत्र बंधन हमारा संस्कार है।यह पवित्र संबंध है। जिससे पूरी सृष्टि चलती है। पवित्र तंतु संबंध,अपनी संस्कृति में यह शक्ति उपासना का पर्व है। संस्कार प्रेम को बांधता है। यह लोगों को जोडता है।
ब्रम्हा जी शिव जी से कहते हैं कि आपका मंगल परिणय महोत्सव चाहते हैं । आपने प्रभू जी को आश्वासन दिया है।वैशाख शुक्ल पक्ष पंचमी दिन गुरुवार को विवाह का मुहूर्त निकाला गया।
भगवान विष्णु, ब्रम्हा जी, दिक् पाल, देवता बाराती बने। नंदी पर सवार शिव जी दूल्हा बन कर चले। शिव जी ने गणों को आह्वान कर दिया। दसों दिशाओं में संदेश फैल गया । जितने गण ,उतने गण। नाचते ,गाते गण बाराती चले। मुख सबके लंबे - लंबे हैं। श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए उन्होंने अपील की कि सार्वजनिक कार्यों में व्यक्तिगत आक्षेपण, कटु वचन नहीं बोलना चाहिए । विवाद , झंझट, मन खराब करने वाला वचन ना बोलें। मौन रहें, छेड़े नहीं । प्रेम में रहें। बच्चों को निडर बनाओ। बेटी को कराटे सिखाओ। मजबूत बनाओ। 30-40 साल के जवान सीधे बैठें और सीधा बैठें। शिवाजी, छत्रपति, वीर दुर्गादास, माता अहिल्याबाई जैसा वीर , शक्तिशाली बनो । वीर भाव रखो।
श्रीराम जी की पूजा ही मत करो। श्री राम जी को बूझने और जूझने की जरुरत है।पूरा विश्व भारत की ओर देख रहा है। कायरता , कमजोरी की कोई जगह नहीं है। संस्कार परिणयोत्सव का महत्वपूर्ण तत्व विषय है।
अपनी गृहस्थी दुनिया की श्रेष्ठतम गृहस्थी है। मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ निकला है। छग के एक पूर्व मंत्री की सराहना करते हुए महाराज जी ने कहा कि उनकी पत्नी की दृष्टि में समस्या होने पर भी वो पूर्ण भाव से सेवा करते हैं। गृहस्थी में प्रेम , समर्पण, विश्वास बनाए रखना चाहिए । जो नसीब में है , जरुर मिलेगा।
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